13 th कुमायूँ की चार्ली कम्पनी रेजांगला में किस बहादुरी से लड़ी थी  120 सैनिकों की टुकड़ी नें 1300 चीनी सैनिकों को मार दिया।

 

साल 1963 का महीना जनवरी अपनी मियाद पूरी करके बीत चुका था। जनवरी कुछ यूं आया और गया जैसे ही किसी सरकारी नौकरी का लिपिक बिना रोमांच की नौकरी से रिटायर होता है, पर फरवरी बड़े मसलों के साथ आने को तैयार था। वह फरवरी जो कभी रिटायर नहीं होने के लिए आई थी। जब जब उस हक़ीक़त का हिसाब देना होगा। आज 57 वर्ष की हो चुकी इस फरवरी को आंख पर ऐनक लगाकर उन दस्तावेजों से धूल हटाकर यह कहानी कहनी होगी। वह कभी सेवानिवृत्त नहीं हो सकेगी। बदन को थरथरा देने वाली ठंड में फरवरी 1963 में लौटने से पहले खुद फरवरी को भी मफलर बांधना होगा।

एक गडरिया रेजांगला की तरफ बढ़ रहा है वह गुमराहीयों में इधर आ निकला है। उसे कहीं और जाना था लेकिन किस्मत उसे इस तरफ ले आई थी। वहां थर्टीन कुमायूं बटालियन की C कंपनी के 113 सैनिक अपने कमांडिंग ऑफिसर के साथ अपने घर लौटने के लिए बेताब थे लेकिन वह जिंदा नहीं थे। उस भेड़ चराने वाले ने यह देखकर होश हवास खो दिए कि हर सैनिक के साथ में अभी उनकी टूटी हुई 3 नॉट 3 राइफ़ल्स थी और हर जवान के शरीर पर गोलियों के जख्म थे। किसी के हाथ में टूटकर उड़ चुकी राइफल का बट था। लेकिन बट पर सैनिकों की पकड़ मौत के बाद भी ढीली नहीं हो पाई थी।

बटालियन में चलने वाले नर्सिंग असिस्टेंट हाथ में अब भी सीरिंज थी। लेकिन सीरिंज के अंदर गोली लगने पर होने वाले दर्द को रोकने वाला मॉर्फिन या दर्द निवारक जम गया था। दूसरे हाथ में जख्म पर बांधने वाली पट्टी का एक गोला था। आज 1963 की फरवरी को ये बताना था कि यह भगोड़े नहीं वह सैनिक थे जिन्हें न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि दुनिया में उनके अदम्य साहस के लिए कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। फरवरी 1963 यहीं तक इसे सुना सकता था लेकिन इस हकीकत के लिए उसने तीन महीनों के 3 पन्ने पलट दिए हैं।

साल था 1962 नवंबर महीने का 18 वां दिन था। देश में दीपावली का जश्न चल रहा था दूसरी तरफ लद्दाख के माईनस टेम्प्रेचर में दीपावली पर अपने घरों को ना लौट सके। 124 जवान लद्दाख़ की चुशूल वैली में वह करने जा रहे थे जिसे ना चीन भुला सकेगा ना भारत और ना ही विश्व। 13 th कुमायूं के 120 जवान दक्षिण हरियाणा अहिरवाल क्षेत्र यानी गुड़गांव, रेवाड़ी, नारनौल और महेंद्रगढ़ के थे। ज्यादातर यह हरियाणा के वो नौजवान थे जिन्हें कभी बर्फ़ीली घाटियों का अनुभव ही नहीं था। नए नए ये रंगरूट अभी-अभी सेना में आए थे और कश्मीर के बारामूला में पोस्टेड थे। चीन के 5 से 6 हजार सैनिकों के लद्दाख में हमला करने की सूचना पहुंची थी और इन्हें कश्मीर के बारामुला से 13 th कुमायूं बटालियन में रेजांगला भेज दिया गया।

हिंदुस्तानी फौज की दूसरी टुकड़ियां भी गन हिल पहाड़ी, गुरुंग पहाड़ी और मुग्गेर की पहाड़ियों पर डिप्लोय कर दी गई। माइनस 15 डिग्री की भीषण सर्दी में 13 th कुमायूं की चार्ली कंपनी 17800 फ़ीट पर त्रिशूल पर्वत पर 3000 गज लंबे और 2000 गज चौड़े रेजांगला दर्रे पर तैनात कर दी गई। रेजांगला की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि थर्टीन कुमायूं की सी बटालियन की पांच प्लाटून नदी के एक तरफ डिप्लोय की गई और बाकी प्लाटून्स नदी की दूसरी तरफ। समुद्र से 5000 मीटर की ऊंचाई वाला रेजांगला उस दृश्य को देखने वाला था जो सदियों में ही कोई जगह देख पाती है। उस समय भारतीय सेना के सेनाध्यक्ष रहे टी.एन रैना ब्रिगेडियर हुआ करते थे।

टी.एन.रैना ने एक लिखित आदेश जारी किया जिसमें उन्होंने साफ कहा था कि आखरी गोली और आखिरी जवान लड़ना है। यकीन मानिए जज्बा शब्द खुद पर इतराने लगा था क्योंकि उसे पता था 13 th कुमायूं की सी कंपनी के पास ना ही अच्छे कपड़े थे और ना ही माइनस 15 डिग्री के लायक जूते, सूती पैंट, स्वेटर और हल्की सर्दी लायक कोट ही उनके पास थे। चार्ली कम्पनी ने अपने लिए बंकर बनाने की खुदाई शुरू कर दी थी और नवंबर के पहले सप्ताह तक वो बंकर तैयार भी कर चुकी थी। रेडियो पर खबरें आ रही थी की कितनी आसानी से चीनी सेना ने तबके NEFA यानी नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी मतलब अरुणाचल प्रदेश तक बढ़त बना ली है।

15 नवंबर 1962 तक ब्रिगेड हेडक्वार्टर जो कि मुश्किल से त्रिशूल पर्वत की तलहटी में 5 किलोमीटर नीचे था। वहां से चार्ली कंपनी के पास प्रस्ताव आया कि चीनी सेना भीषण हमला कर रही है। चाहे तो 13 th कुमायूं बटालियन रेजांगला पोस्ट छोड़ कर वापस आ सकती है। लेकिन 13 th कुमायूं के कमांडिंग ऑफिसर मेजर शैतान सिंह ने ऐसा करने से इनकार दिया। वो मेजर शैतान सिंह जिनका नाम उनकी सौम्यता से बिल्कुल मेल नहीं खाता था। 1 नवंबर 1924 को राजस्थान के जोधपुर के छोटे से गांव बन्सार ने शायद यह नहीं सोचा होगा कि जिस शिशु के मुलायम पैर उसपर पड़ने जा रहे हैं वो पूरी दुनिया में उस बच्चे की वजह से जाना जाएगा।

पिता लेफ्टिनेंट कर्नल हेम सिंह भाटी ने न जाने क्या सोचकर बच्चे का नाम शैतान रख दिया था। यह अलग बात है कि चीन उसे हमेशा रेजांगला का शैतान ही कहेगा। बेहद शांत स्वभाव का यह बच्चा लड़कपन में कमाल का फुटबॉलर रहा। मैट्रिक करने के बाद 1943 में जसवंत कॉलेज का विद्यार्थी रहा। जिस बरस देश आजादी की घोषणा कर रहा था उसी बरस 1947 में शैतान सिंह यौवन के चरम पर कॉलेज से पासआउट हुए। दो ही बरस बीते और वो जोधपुर रियासत के राज्य बलों में सैन्य अधिकारी चुन लिए गए।

दिन था 1 अगस्त 1949. जोधपुर रियासत उस वक्त भारत में विलय नहीं हुई थी बाद में जोधपुर का विलय भारत में हुआ और मेजर शैतान सिंह को कुमायूं रेजिमेंट में ट्रांसफर कर दिया गया। साल 1961 आया और गोवा के भारत में विलय के अभियान में मेजर शैतान सिंह ने इस बड़े काम में अपनी साझेदारी निभाई।  तब उन्हें वो पद्दोन्नति उन्हें मिली जिसे हम उनके नाम के साथ जोड़ते हैं। 11 जून 1962 को उन्हें इंडियन आर्मी में मेजर रैंक पर प्रोमोट कर दिया गया। रेजांगला की पोस्ट छोड़ने की बात पर मेजर शैतान सिंह ने बिग्रेडियर टी.एन. रैना को संदेश भेज दिया कि किसी भी सूरत में 13 th कुमायूं की चार्ली कम्पनी पीछे नहीं हटेगी।

हरियाणा के 118 अहीर और नेतृत्व कर रहे थे राजपूत मेजर शैतान सिंह। मेजर शैतान सिंह ने तकरीबन 40 जवानों को तीन प्लाटून्स में बांट दिया और तीनों प्लाटून को सात आठ और नौ नम्बर प्लाटून में बांट दिया जिन्हें आपस में 1 किलोमीटर की दूरी पर तैनात किया गया। 18 नवम्बर 1962 का रविवार कुछ ज्यादा सर्दी के साथ ढलने के लिए शुरू हुआ। शाम तक दिन सिर्फ बीत जाने के लिए चल पड़ा और बीत गया। ऑपरेशनल पोस्ट और LP यानी लिसनिंग पोस्ट रात तक खाने-पीने का इंतजाम कर चुकी थी क्योंकि यह बेहद मुश्किल था। पोस्ट पर पानी उबलने में भी घंटों लग जाते हैं। ऐसी भीषण सर्दी में तीनो प्लाटुन्स हर हरकत पर नजर रखे हुए थी।

ऑपरेशनल पोस्ट का काम था दिन में पोस्ट पर नजर जमाये रखना और लिसनिंग पोस्ट रात में हर हलचल का जायजा लेती थी। 3:45 पर एलपी को कुछ हलचल नजर आई और एलपी ने इनफॉर्म किया कि 8 से 10 चाइनीज सैनिक उनकी पोस्ट की रेकी कर रहे हैं। रैकी प्लाटून नंबर 7 की तैनाती वाले एरिया में की जा रही थी। लाइट मशीन गन हैंडल कर रहे नायक हुकुम सिंह ने LMG फायर खोला और एक शांति छा गई और वायरलेस ऑपरेटर रामचंद्र ने मेजर शैतान सिंह और सारी प्लाटूंस को यह खबर दे दी। भारतीय सेना की 13th कुमायूं के इस जवाब ने चाइनीज सैनिकों को उबाल दिया।

तकरीबन 400 चीनी सैनिक आर्टिलरी सपोर्ट के साथ प्लाटून नंबर 7 की तरफ दौड़ पड़े पर चीनी सैनिकों को पता नहीं था कि आज उनका सामना इंडियन आर्मी से हुआ था। नायक हुकुम सिंह ने लाइट मशीन गन का मुंह खोल दिया और कुछ ही देर में 250 चीनी सैनिकों की लाशों से दर्रा अट गया। भारतीय सैनिकों को गुमराह करने की नियत से चीनी सेना ने याक के गले में लालटेन बांधकर प्लाटूंस की तरफ भेजा और भारतीय सेना के बर्स्ट उनको जाकर लगे। मेजर शैतान सिंह समझ गए थे कि थर्टीन कुमायूं की सी कंपनी का असलहा बर्बाद हो जाए इसलिए चीनी मिलिट्री ने यह जानबूझकर एक खेल खेला है।

मेजर शैतान सिंह चीनी सेना की चाल भांप चुके थे उन्होंने फायरिंग रोक दी। चीनी सेना को भी पता चल चुका था की जिसे वह मामूली काम समझ रहे थे वह इतना आसान नहीं था। उनके 250 से ज्यादा सैनिक मारे जा चुके थे और भारत की तरफ से कोई कैजुअल्टी नहीं हुई थी। चीन ने भारी बमबारी शुरू कर दी क्योंकि भारतीय सेना की मशीन गंस की रेंज में आए बगैर चीनी आगे नहीं बढ़ सकते थे। हेवी मोटर्स दागे गए और चार्ली कंपनी के प्लाटून नंबर 8 के कई बंकर तबाह हो गए लेकिन इस बार भी कोई भारतीय जवान हताहत नहीं हुआ। यह चीनी सैनिकों का दूसरा प्रयास था जो खाली गया।

रात अब उजाले की तरफ बढ़ रही थी 4:45 पर प्लाटून नंबर आठ पर फिर से हैवी बम्बोर्टमेंट हुआ। लेकिन भारतीय सैनिकों की पोजीशन ज्यादा अच्छी होने की वजह से फिर कोई जान नहीं गई। इसी बीच निहाल सिंह की एमएमजी से निकली गोलियों ने 150 सैनिकों को मार डाला। मेजर शैतान सिंह लगातार अपने जवानों का हौसला बढ़ा रहे थे और बिना कवर फायर के वह अपने जवानों के बंकरों तक जाकर उन्हें समझा रहे थे कि अगले कुछ निर्णायक समय में उन्हें तकरीबन 3000 चीनी सैनिकों का सामना करना है। चार्ली कम्पनी की तीनों प्लाटून्स को चीनी सेना ने घेर लिया और एक साथ धावा बोला।

इस बार मेजर सिंह जान चुके थे कि उनके पास लाइट मशीनगन और थ्री नॉट थ्री राइफल्स हैं। जिसके मुकाबले चीनियों के पास एडवांस राइफल्स हैं। भारतीय सैनिकों की थ्री नॉट थ्री राइफल को हर बार फायर करने के बाद रीलोड करना पड़ता था। मेजर शैतान सिंह ने दो मशीन गन खुद ली और सुबह के 6:30 तक रेजांगला की बर्फ लाल हो गई । मेजर शैतान सिंह और उनके जवानों ने 400 चीनी सैनिकों को मार डाला। सूबेदार रामचंद्र यादव बार-बार मेजर शैतान सिंह को बाहर निकलने से मना करते रहे लेकिन मेजर शैतान सिंह ने बार-बार उनकी बात को नजरअंदाज किया। इधर थ्री नॉट थ्री को बार-बार रीलोड करने से जवानों की उंगलियां जम रही थी।

पर कमांडिंग ऑफिसर शैतान सिंह के हौसले को देखकर फिर उनमें ताकत लौट आती। चीनी सैनिक इतनी बड़ी कैजुअल्टी से घबरा चुके थे लेकिन चीनी सैनिक बड़ी संख्या में थे। तो उनके लिए कैजुअल्टी ज्यादा बड़ी चुनौती नहीं थी। बल्कि थर्टीन कुमायूं का भीषण हमला अब हजारों चीनी सैनिकों के लिए नाक का सवाल बन चुका था। चीनी सेना ने अब एक साथ उन पर हमला किया 15 मिनट के संघर्ष में महज 120 जवानों की टुकड़ी के तंबू जल उठे। सेलिंग की वजह से भारतीय जवानों के अंग कटकर इधर उधर जाकर गिरने लगे पर मेजर शैतान सिंह हार मानने के लिए तैयार ही नहीं थे। दूसरी तरफ घोड़े और याक पर असलहा बांधकर चीनी सैनिक आगे बढ़ रहे थे।

भारतीय सैनिकों को लगा कि अल्फा टीम का रीनफोर्समेन्ट उनके लिए आ रहा है लेकिन वह चीनी सैनिक थे। चीनी सैनिकों ने तीसरा हमला शुरू कर दिया था और अब वह भारतीय सैनिकों को मारना शुरू कर चुके थे। गोलाबारी में एक शेल आकर मेजर शैतान सिंह के हाथ में लगा पर मेजर शैतान सिंह ने नर्सिंग असिस्टेंट से जख्म की पट्टी करवा कर हमला जारी रखा और अपने नेतृत्व में बचे हुए सैनिकों का जोश कम नहीं होने दिया पर अचानक ही रिज पर मेजर साहब के पेट में एक चीनी मशीन गन का पूरा बर्स्ट आकर लगा और उनका पूरा पेट फट गया। मेजर शैतान सिंह की तरफ कवर के लिए दौड़े हरफूल सिंह ने उस चीनी सैनिक की जान ले ली जिसने मेजर साहब पर फायर किया था।

उसी वक्त हरफूल सिंह पर भी गोली चली और गिरते-गिरते उन्होंने सूबेदार रामचंद्र यादव से कहा कि मेजर साहब को दुश्मन के हाथ मत लगने देना। अब मेजर शैतान सिंह सूबेदार रामचंद्र की गोद में थे और बार-बार बेहोश हो रहे थे। वापस होश में आने पर वह बोलते कि रामचंद्र मेरा बेल्ट खोल दो मुझे पेट में तेज दर्द हो रहा है लेकिन सूबेदार रामचंद्र यादव ने उनकी कमीज को छुआ तो उन्हें पता लगा कि मेजर शैतान सिंह की आंते पेट से बाहर आ चुकी थी इसलिए सूबेदार यादव ने ऐसा करने से मना कर दिया। मेजर शैतान सिंह लगातार सूबेदार रामचंद्र यादव को कह रहे थे कि वह बटालियन में वापस लौट जाए और वहां जाकर यह बताएं कि हम कैसे लड़े।

रामचंद्र यादव हरफूल सिंह की बात याद करते हुए अपना वादा याद करते रहे कि मेजर साहब को दुश्मन के हाथ मत लगने देना। दूसरी तरफ प्लाटून सात के जवान संग्राम सिंह ने गुस्से में कई चीनी सैनिकों को हैंड टू हैंड फाइट में पत्थरों पर भिड़ाकर मारना जारी रखा लेकिन प्लाटून नंबर 7 का कोई जवान आखिर में जिंदा नहीं रहा। मेजर शैतान सिंह लगातार सूबेदार रामचंद्र यादव को लौट जाने के लिए कह रहे थे और कह रहे थे कि खुद वह यहीं वीरगति को प्राप्त होंगे। रामचंद्र यादव ने एक 800 मीटर गहरे गड्ढे, जो कि भारतीय पोस्ट की तरफ था मेजर शैतान सिंह को खुद से बांधकर लुढ़कना शुरू किया और फिर उन्हें कंधे पर उठाकर नीचे की तरफ बढ़े।

लेकिन नीचे भारतीय फौज आग लगा चुकी थी ताकि चीनी सेना आगे ना बढ़ सके संभवतः किसी को यकीन ही नहीं था कि ऊपर रेजांगला में क्या हुआ होगा! सेना के हिसाब से सारे सैनिक बंदी बना लिए गए होंगे। रामचंद्र यादव के कंधे पर मेजर शैतान सिंह थे, वह मेजर जिसने 13 सौ से ज्यादा चीनियों को मार डाला था वह मेजर जिसने 120 जवानों के साथ भी ब्रिगेडियर टी.एन.रैना को पोस्ट खाली करने से इनकार कर दिया था। वह मेजर जिसने पैर में रस्सी बांधकर मशीन गन चलाई थी हाथ जख्मी होने के बाद भी लड़ा। जिसकी आंते पेट से बाहर आ गई उसके बाद भी वह वहीं शहीद होना चाहता था। वह जो पीछे नहीं हटा।

मेजर शैतान सिंह की कलाई पर बंधी घड़ी सवेरे 8:15 पर बंद हो गई और सूबेदार रामचंद्र यादव को पता चल गया कि मेजर साहब वीरगति को प्राप्त हो गए हैं क्योंकि मेजर शैतान सिंह की घड़ी शरीर की धड़कन के साथ चलती थी जिसे आजकल पल्स वॉच या लाइफ वॉच भी कहा जाता है। सूबेदार रामचंद्र यादव ने मेजर शैतान सिंह को एक पत्थर के सहारे लिटाया उनको सैल्यूट किया और हेड क्वार्टर की तरफ बढ़े। मेजर शैतान सिंह जा चुके थे लेकिन अभी भी वीरों के सम्मान को दुनिया को करना था लौटने से पहले रामचंद्र यादव ने कुछ निशान बनाए ताकि वापस लौटकर मेजर शैतान सिंह की देह को लाया जा सके।

नीचे बढ़ते वक्त उन्हें भारतीय सेना की जीप मिली और उन्हें मिलिट्री हॉस्पिटल भेजा गया। लगभग 120 जवानों ने कैसे 1300 चीनी ट्रूप्स को मारा सूबेदार रामचंद्र की इस बात पर हेड क्वार्टर तक ने भरोसा नहीं किया और उन्हें कोर्ट मार्शल की धमकी दी गई। दिल्ली हेड क्वार्टर पर उनके खिलाफ इंक्वायरी तक बैठी। थर्टीन कुमायूं की चार्ली कंपनी के 113 शहीद अभी भी बर्फ में अपनी देह के सैन्य सम्मान का इंतजार कर रहे थे। लग रहा था कि वह इंतजार इसलिए कर रहे थे कि भारतीय सेना की इस अदम्य गौरव गाथा पर लोग यकीन कर सकें।

इस जंग में दो-तीन लोग जो बचे जिनमें युद्ध बंदी भी थे यह सुनकर आपकी आंखों से आंसू निकल सकते हैं कि उनको सामाजिक रुप से बहिष्कृत कर दिया गया, उनके बच्चों को स्कूल से निकाल दिया गया लेकिन फिर फरवरी को आना पड़ा और यह बताना पड़ा कि मेजर शैतान सिंह के अदम्य साहस ने चीन के हौसले पस्त कर दिए थे। दरअसल 18 नवम्बर की इस जंग से ख़ौफ़ खाई चीनी सेना ने 20 नवम्बर को सीज फायर का एलान कर दिया था। उसी दौरान भारी बर्फबारी की वजह से भारतीय सेना ने भी रेजांगला को नो मैंस लैंड घोषित कर दिया।

इसी वजह से इण्डियन आर्मी को तकरीबन तीन महीने पता ही नहीं चल पाया कि 13 th कुमायूँ की चार्ली कम्पनी रेजांगला में किस बहादुरी से लड़ी थी और न ही उन्होंने सूबेदार रामचंद्र यादव की बात मानी क्योंकि किसी को यकीन ही नहीं हुआ कि 120 सैनिकों की टुकड़ी नें 1300 चीनी सैनिकों को मार दिया होगा। जब बर्फ पिघली और गड़रिये ने नजारा आकर सेना को बताया तो खुद ब्रिगेडियर रैना सैनिकों के साथ रेजांगला की उस पोस्ट पर पहुंचे। 3 महीने बाद भी 113 भारतीय सैनिक जो शहीद हो चुके थे अब भी कॉम्बैट पोजीशन में थे। जब यह नजारा खुद ब्रिगेडियर टी.एन.रैना ने देखा तो वह फूट-फूटकर रो पड़े और वह अधिकारी भी जिसने सूबेदार रामचंद्र यादव की बात पर यकीन नहीं किया था।

खुद बिग्रेडियर टी.एन रैना ने इन सभी शहीदों को रेजांगला में मुखाग्नि दी और शहीद मेजर शैतान सिंह का अंतिम संस्कार जोधपुर में हुआ भारत का सर्वोच्च सम्मान किसी को यूं ही नहीं दिया जाता।

अब फिर किसी कलम से ये कहानी फिर यूँही लिखी जाएगी और सदियों तक इसे कहने सुनने का सिलसिला खत्म नहीं होगा क्योंकि कहानी की हकीकत अपना दर्जा बुलन्द क्यों रखती है कि कलमकार आते रहेंगे लिखते रहेंगे। इतिहास का ये पन्ना फिर खुलने के लिए बंद हो रहा है।

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