विंग कमांडर अभिनंदन पाकिस्तान की कैद में 60 घंटे गुजार कर लौटे तो पूरा देश उनके अकल्पनीय शौर्य के लिए त्याग और पराक्रम के लिए उनको सलाम कर रहा था। हम सब ने देखा कि अभिनंदन पाकिस्तान में किस तरह के मुश्किल हालातों का सामना करके लौटे लेकिन उससे पहले अभिनंदन ने जो मुश्किल हालात और परेशानियां सही वो और भी अद्भुत रही हैं । अभिनंदन ने जब पाकिस्तानी फाइटर प्लेन का पीछा किया तो अभिनंदन के प्लेन पर भी हमला हुआ उस हमले के दौरान अभिनंदन ने किन किन परिस्थितियों का सामना किया होगा जो एक फाइटर पायलट ही कर सकता है।

अभिनंदन पाकिस्तानी फाइटर प्लेन F16 का पीछा कर रहे थे और पाकिस्तानी एयर डिफेंस सिस्टम से उनके Mig 21 बायसन पर हमला हुआ और प्लेन में आग लग गई । इस स्थिति में अभिनंदन को अपने मिग 21 बायसन से इजेक्ट करना पड़ा पर ये इतना आसान नहीं है। आज हम आपको सबसे मुश्किल और पेचीदा हालातों की वो स्थितियां समझाने की कोशिश करेंगे जो अभिनंदन ने इजेक्ट के वक्त झेली होंगी । अभिनंदन ने जब इजेक्ट किया उस वक्त उनके पैराशूट ने उन्हें सीमा के दूसरी तरफ उतारा और वहां भी उन्हें मुश्किल हालातों का सामना करना पड़ा। आज हम आपको इजेक्शन की वो तमाम चीजें समझाने की कोशिश करेंगे जिन्हें आप जानना चाहते हैं ।

फाइटर प्लेन्स अपनी घातक क्षमताओं और स्पीड के लिए जाने जाते हैं लेकिन कभी भी कोई पायलट एयर कॉम्बेट की डॉग फाइट की वजह से मुश्किल में आ सकता है जब उसका प्लेन ध्वस्त होने वाला हो । आपको जानकर हैरत हो सकती है की अब तक तकरीबन 18 से 20 फीसदी पायलेट्स को फेटल इजेक्शन झेलने पड़े हैं । फेटल इंजेक्शन का मतलब ही जान की बाजी लग जाना होता है। पायलटस हमेशा इस तरह से ट्रेन किए जाते हैं कि वह आखिरी वक्त तक ज्यादा से ज्यादा इंसानी जिंदगीयों को प्लेन गिरने की स्थिति में बचा सके और इसी वजह से लेट इजेक्शन की चुनौतियां पायलेट्स को झेलनी पड़ती है जो खुद उनकी जिंदगी खत्म कर देती है कई बार । जैसा कि पता ही है फाइटर पायलट्स अपनी जान की बाजी भी अपने मिशन की सक्सेस के लिए लगा देते हैं । कोई भी पायलट अपने गिरते हुए विमान को तकरीबन 10000 फीट पर इजैक्ट करने के लिए स्वतंत्र होते हैं हालांकि यह सीमा पायलट पर ही निर्भर करती है कि वह कब ईजेक्ट करें लेकिन आमतौर पर पायलट मिशन के दौरान फैटल इजेक्शन ही करते हैं क्योंकि अपने एयरक्राफ्ट से प्यार और देश के लिए समर्पण का जज्बा इस कदर उन पर हावी होता है कि वह खुद का मोह त्याग देते हैं । दस हजार फीट से बारह हजार फीट से इजेक्शन करने पर भी पायलट जेट्स की ग्रेविटी लेवल के हिसाब से 5000 फीट तक पहुंच ही जाएगा जो तय सीमा के फैटल इजेक्शन के बराबर ही है।इजेक्शन कितना भी ठीक समय और सेफ पैरामीटर्स पर किया जाए लेकिन अधिकतर मामलों में फिजिकल इंजरी होना तय सा होता है । बहुत ही कम विरले पायलट ही सेफ लैंडिंग विद नो इंजरी को प्लेस कर पाते हैं। फाइटर पायलटस की सबसे मददगार साथी इजेक्शन के वक्त उनकी सीट होती है जो आज के समय में बेहद एडवांस टेक्नोलॉजी से लैस होती है । सीट के नीचे मिनी रॉकेट्स फिक्स्ड होते है जो पायलट को सीट के साथ बाहर फेंक देते हैं और वह भी कई मीटर तक। जब भी कोई पायलट इजेक्शन का फैसला करता है तो उसे एक तय पोजीशन में बैठना होता है वह अपने पैरों को सटाते हुए पीछे करता है ओर चेस्ट को बिल्कुल सीधा रखता है। अपने कंधे सिकोड़कर अपने हाथों को छाती पर चिपका लेता है अगर ऐसा नहीं किया जाए तो 2000 KM/H की स्पीड पर उड़ रहे प्लेन से लगने वाला शरीर का कोई भी हिस्सा अलग होकर जहाज में ही रह जाएगा। एडवांस फाइटर प्लेन अब सिंगल सीटर होते हैं लेकिन अगर पिछली सीट पर कोई ट्रेनी या को पायलट बैठा हो तो इजेक्शन कमांड देनी होती है जैसा कि टीवी चैनल पर आप एक शब्द सुन रहे हैं बेलआउट । यही वह कमांड है जो दोहराई जाती है। अब जो विमान भीषण गति से उड़ते हैं उनकी तुलना उड्डयन के इतिहास से की जाए तो वह कम रिस्क वाले जहाज थे क्योंकि उनमे जेट इंजन की जगह पिस्टल इंजन लगा होता था। और टॉप स्पीड बहुत कम होती थी। पहले के एयरक्राफ्ट कम स्पीड से उड़ते थे जिसकी वजह से उनके कॉकपिट पर केनोपी की अधिकतम जरूरत नहीं होती थी। पहले के जहाजों की अधिकतम स्पीड 112.654 के आस पास होती थी जो अब के विमानों के सामने कंपेयर ही नहीं की जा सकती क्योंकि अभिनंदन के मिग 21 बायसन की गति 2230 Km/H है और अभिनंदन जिस F16 का पीछा कर रहे थे उसकी टॉप स्पीड 2414 Km/H है। पुराने विमानों से पायलट धीरे-धीरे आराम से कूदकर सतह पर पहुंच जाते थे।

पायलट को कॉकपिट से बाहर 100 फ़ीट तक राकेट सिस्टम फेंकता है और इसमें सिर्फ 0.2 से 1 सेकंड का ही वक्त लगता है। 20 से 30 हजार फीट से किए गए इजेक्शन से पायलट को जमीन पर आने में 20 से 25 मिनट का समय लगता है । इतनी ऊंचाई पर हवा का दबाव कम होता है और पायलट को अपनी ऑक्सीजन बोटल का इस्तेमाल करना पड़ता है जिससे कम मात्रा में ऑक्सीजन होती है और फेफड़े भयंकर दबाव झेलते हैं । पायलट को 12G ( ग्रेविटेशनल फोर्स ) झेलना पड़ता है। जमीन पर मौजूद सभी वस्तुओं या इंसानों पर सिर्फ 1 जी का फोर्स ही लगता है । हवाई जहाज मैं हाई स्पीड पर यह बल बहुत ज्यादा होता है मतलब 70 किलो के पायलट को अगर 12 जी का बल सहना पड़े तो उसके शरीर पर 840 किलोग्राम का भार सहने जितना बल होता है और अभिनंदन के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा। इस फ़ोर्स पर पायलट बिना कैनोपी वाले कॉकपिट में हाथ भी नही उठा पाएगा कूदना तो बहुत दूर की बात है। इसी को देखते हुए रॉयल एयरफोर्स ने निर्णय लिया था कि फाइटर प्लेंस में इजेक्शन सिस्टम लगाया जाए।

शुरुआती दौर में इजेक्शन सीट बहुत ज्यादा कैपेबल नहीं थी उनका पहले पायलट के साथ टेस्ट किया जाता था। एक रेल के नीचे प्रपलसन सिस्टम प्लेस किया जाता था । जब नीचे लगे सिस्टम को फायर किया जाता था तो उस सीट पर बैठा व्यक्ति रेल में ऊपर तक कई फीट समान रूप से उठता था जैसे एक इजेक्शन के दौरान होता है। पुराने इजेक्शन में एक पुलिंग मास्क को पायलट चेहरे पर खींचता था जो कि उसके इंजेक्शन सिस्टम को बटन करता था और इसकी वजह थी कि पायलट उसी पोजीशन को कैरी कर सके जो आवश्यक है। नए जेट्स में सीट ही सब चीजों का कोंबो होती है। पायलट के पैरों के बीच एक लीवर होता है जिसे वह आपात स्थिति में खींचता है और इसे फायर हैंडल कहते हैं । सबसे पहले कॉकपिट पर लगी कैनोपी उड़ जाती है। पहले के विमानों में कैनोपी उड़ती नहीं थी बल्कि टूटती थी उससे भी हेड इंजरी हो सकने के चांसेस होते थे। अभी के जेंट्स में कैनोपी उड़ती है और उसके बाद ही बेलआउट होता है क्योंकि ठीक उसके बाद ही इग्निशन स्टार्ट होता है अगर किसी स्थिति में कैनोपी उड़े नहीं तो सीट का ऊपरी हिस्सा उसे तोड़कर इजैक्ट करवा देता है। मिनी रॉकेट पायलट को जब बाहर फेंक देते हैं उसके बाद में ड्रैग पैराशूट खुल जाते हैं जो सीट की स्पीड को कम करते हैं । नई जनरेशन के फाइटर प्लेंस में 20G का फ़ोर्स लग सकता है । उसके बाद मैन पैराशूट जो पायलट के शरीर पर ही बंदा होता है वह खुलता है जो लैंडिंग करवाता है। ज्यादातर पायलट को फैटल इजेक्शन के वक्त रीड की हड्डी या गर्दन की हड्डी टूटने का खतरा रहता है जो उन्हें जीवन भर के लिए लाचार कर सकता है।स्पाइनल कम्प्रेशन की वजह से इजेक्शन के बाद जब पायलट की हाइट नापी जाती है तो यह कुछ सेंटीमीटर कम हो जाती है । जब फाइटर पायलट ट्रैन किये जा रहे होते हैं तो उनकी जी फोर्स की ट्रेनिंग दो या 2.5 तक होती है। इसकी वास्तविक प्रैक्टिस 12 या 20G तक करवा पाना पॉसिबल नहीं है । यह सिर्फ रियल सिचुएशंस के लिए ही एक पायलट फेश करता है। आप सोच रहे होंगे कि क्या इजेक्शन टेस्ट अब रियल जेट्स में होते हैं नहीं, यह एक बुलेट ट्रेन जैसे सिम्युलेटर के डमीज के साथ परफॉर्म किए जाते हैं जब रियल सिचुएशंस को समझना हो, तो आपको पता चला होगा कि अभिनंदन ने जमीन पर ही नहीं आसमान में भी मौत से अपने देश के लिए जंग लड़ी है।

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